Monday, February 17, 2020

ज़िंदगी और मौत

ज़िंदगी और मौत 



रिश्ते से विश्वास कुछ ऐसे टूट रहा है,
जैसे साख से सूखे पत्ते। 

चंद लम्हो में विखर जाते है सब अपने,
जब आप अपने पास न हो। 

ना जाने सब क्यों जीते है अपने बेरंग सी ज़िंदगी ,
जब ज़िंदगी से कुछ आस न हो। 

हर किसी कई मुक्क़दर में लिखा है एक दिन मरना ,
ना जाने क्यों जीने की तम्मना करते है लोग। 





हर सुबह हर दिन जीने की चाहत जगती है ,
ना जाने हर शाम को क्यो करती है मरने की चाहत। 

जब से ज़िंदगी ढूंढने निकला हूँ ,
ना जाने क्यों खुद को ही भूल गया हूँ। 

एक दिन मिली थी ज़िन्दगी  किसी मोर पर ,
उसने कहा ढूँढ लो तुम मौत को, 
मुझे दर्द देना है किसी और को ,
जब  में गया मौत के पास उसने कहा ,
जी ले अपनी ज़िंदगी क्यो आये हो मौत को। 


!कुछ छंद आनंद के नाम !










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