गुलज़ार के लब्ज़
हादसा बस इतना सा था ,
अपनी बर्बादी को हम इश्क़ समझ बैठे।
ना कोई हमदर्द था ना कोई दर्द था ,
फिर एक हम दर्द मिला और उसी से सारा दर्द मिला।
कुछ रिश्ते किराये के मकान जैसे होते है ,
उन्हें आप कितना भी सजा लो कभी आपके नहीं होते।
तब भी थे, अब भी है और हमेशा रहेगी ,
तुमसे मोहब्बत है, पढाई नहीं जो पूरी हो जाएगी।
मेरा जरा तीखा बोलने पर आ जाती है तुम में कड़वाहट ,
यह इश्क़ है या इश्क़ के नाम पर मिलाबट।
बदले है मिजाज उनके कुछ दिनों से ,
वो बात तो करते है पर बातें नहीं करते।
पसंद न आये मेरा साथ, तो बता देना ,
महसूस भी नहीं कर पाओगे इतना दूर चले जायेंगे।
धन्यवाद आप सब का !
गुलज़ार जी के कुछ छंद।

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