Tuesday, February 11, 2020

गुलज़ार के लब्ज़

गुलज़ार के लब्ज़ 




हादसा बस इतना सा था ,
अपनी बर्बादी को हम इश्क़ समझ बैठे।

ना कोई हमदर्द था ना कोई दर्द था ,
फिर एक हम दर्द मिला और उसी से सारा दर्द मिला। 

कुछ रिश्ते किराये के मकान जैसे होते है ,
उन्हें आप कितना भी सजा लो कभी आपके नहीं होते। 


तब भी थे, अब भी है और हमेशा  रहेगी ,
तुमसे मोहब्बत है,  पढाई नहीं जो पूरी हो जाएगी। 

मेरा जरा तीखा बोलने पर आ जाती है तुम में  कड़वाहट ,
यह इश्क़ है या इश्क़ के नाम पर मिलाबट। 

बदले है मिजाज उनके कुछ दिनों से ,
वो बात तो करते है पर बातें नहीं करते। 

पसंद न आये मेरा साथ, तो बता देना ,
महसूस भी नहीं कर पाओगे इतना दूर चले जायेंगे। 




धन्यवाद आप सब का !
गुलज़ार जी के कुछ छंद। 

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