ज़िंदगी और मौत
रिश्ते से विश्वास कुछ ऐसे टूट रहा है,
जैसे साख से सूखे पत्ते।
चंद लम्हो में विखर जाते है सब अपने,
जब आप अपने पास न हो।
ना जाने सब क्यों जीते है अपने बेरंग सी ज़िंदगी ,
जब ज़िंदगी से कुछ आस न हो।
हर किसी कई मुक्क़दर में लिखा है एक दिन मरना ,
ना जाने क्यों जीने की तम्मना करते है लोग।
हर सुबह हर दिन जीने की चाहत जगती है ,
ना जाने हर शाम को क्यो करती है मरने की चाहत।
जब से ज़िंदगी ढूंढने निकला हूँ ,
ना जाने क्यों खुद को ही भूल गया हूँ।
एक दिन मिली थी ज़िन्दगी किसी मोर पर ,
उसने कहा ढूँढ लो तुम मौत को,
मुझे दर्द देना है किसी और को ,
जब में गया मौत के पास उसने कहा ,
जी ले अपनी ज़िंदगी क्यो आये हो मौत को।
!कुछ छंद आनंद के नाम !