Monday, February 17, 2020

ज़िंदगी और मौत

ज़िंदगी और मौत 



रिश्ते से विश्वास कुछ ऐसे टूट रहा है,
जैसे साख से सूखे पत्ते। 

चंद लम्हो में विखर जाते है सब अपने,
जब आप अपने पास न हो। 

ना जाने सब क्यों जीते है अपने बेरंग सी ज़िंदगी ,
जब ज़िंदगी से कुछ आस न हो। 

हर किसी कई मुक्क़दर में लिखा है एक दिन मरना ,
ना जाने क्यों जीने की तम्मना करते है लोग। 





हर सुबह हर दिन जीने की चाहत जगती है ,
ना जाने हर शाम को क्यो करती है मरने की चाहत। 

जब से ज़िंदगी ढूंढने निकला हूँ ,
ना जाने क्यों खुद को ही भूल गया हूँ। 

एक दिन मिली थी ज़िन्दगी  किसी मोर पर ,
उसने कहा ढूँढ लो तुम मौत को, 
मुझे दर्द देना है किसी और को ,
जब  में गया मौत के पास उसने कहा ,
जी ले अपनी ज़िंदगी क्यो आये हो मौत को। 


!कुछ छंद आनंद के नाम !










Wednesday, February 12, 2020

राहत इन्दोरी

राहत इन्दोरी 






अगर खिलाफ हैं होने दो जान थोड़ी है ,
ये सब धुआं है आसमान थोड़ी है। 

लगेगी आग तो आएंगे घर कई ज़द मैं ,
यहां पर सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है। 

हमारे मुंह से जो निकले वही सदाक़त है ,
हमारे मुंह मैं तुम्हारी ज़बान थोड़ी है। 




मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं ,
लेकिन हमारी तरह हथेली पर जान थोड़ी है। 

जो आज साहिब - इ - मसनद हैं कल नहीं होंगे ,
किरायेदार हैं जाती मकान थोड़ी हैं। 

सभी का खून है शामिल यहां की मिटटी में ,
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है। 

Tuesday, February 11, 2020

गुलज़ार के लब्ज़

गुलज़ार के लब्ज़ 




हादसा बस इतना सा था ,
अपनी बर्बादी को हम इश्क़ समझ बैठे।

ना कोई हमदर्द था ना कोई दर्द था ,
फिर एक हम दर्द मिला और उसी से सारा दर्द मिला। 

कुछ रिश्ते किराये के मकान जैसे होते है ,
उन्हें आप कितना भी सजा लो कभी आपके नहीं होते। 


तब भी थे, अब भी है और हमेशा  रहेगी ,
तुमसे मोहब्बत है,  पढाई नहीं जो पूरी हो जाएगी। 

मेरा जरा तीखा बोलने पर आ जाती है तुम में  कड़वाहट ,
यह इश्क़ है या इश्क़ के नाम पर मिलाबट। 

बदले है मिजाज उनके कुछ दिनों से ,
वो बात तो करते है पर बातें नहीं करते। 

पसंद न आये मेरा साथ, तो बता देना ,
महसूस भी नहीं कर पाओगे इतना दूर चले जायेंगे। 




धन्यवाद आप सब का !
गुलज़ार जी के कुछ छंद। 

गुलज़ार के नाम कुछ शब्द।






गुलज़ार के नाम । 






अगर तलाश करूं कोई मिल ही जायेगा,
मगर हमारी तरह कौन तुमको चाहेगा।



तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा,
मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लाएगा।



मैं अपनी राह में दीवार बन के बैठा हूँ,
अगर वो आया तो किस रास्ते से आएगा।



तुम्हारे साथ ये मौसम फरिश्तों जैसा है,
तुम्हारे बाद ये मौसम बहुत सताएगा।